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रायपुर। छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम के वनगमन पथ से जुड़े स्थलों का विकास तीन चरणों में वर्ष 2029 तक पूरा करने की योजना है। राज्य सरकार चयनित स्थलों पर श्रद्धालुओं और साधु-संतों की सुविधाओं के लिए आश्रय स्थल, सत्संग भवन और सीता रसोई जैसी व्यवस्थाएं विकसित करेगी। इस पहल का उद्देश्य राम वनगमन पथ से जुड़े धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों को सुविधायुक्त बनाना है। हालांकि, स्थलों के चयन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सवाल-जवाब का दौर भी शुरू हो गया है।
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने छत्तीसगढ़ में भगवान राम के वनगमन मार्ग से जुड़े 75 स्थानों को विकसित करने की पहल की थी। इनमें चंदखुरी, शिवरीनारायण, सीतामढ़ी-हरचौका, रामगढ़, राजिम, नगरी-सिहावा, रामाराम, तुरतुरिया और चंपारण सहित नौ स्थलों पर निर्माण कार्य शुरू किया गया था। इसके बाद राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और वर्तमान भाजपा सरकार ने शोध के आधार पर 31 स्थलों को विकास के लिए चयनित किया।
चंद्रखुरी के माता कौशल्या मंदिर को सूची में जगह नहीं
राम वनगमन पथ के लिए चयनित स्थलों की सूची में चंद्रखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर का उल्लेख नहीं होने पर विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं और अन्य स्थलों को सूची में शामिल नहीं किए जाने पर भी आपत्ति जताई है। वहीं, सरकार ने अपने निर्णय के समर्थन में शोध का हवाला दिया है। ऐसे में यह सवाल चर्चा में है कि राम वनगमन पथ से जुड़े स्थलों के चयन के लिए किन ऐतिहासिक और शोध संबंधी आधारों को अपनाया गया है।
दो शोध के आधार पर स्थलों का चयन
सरकार के अनुसार, राम वनगमन पथ से जुड़े स्थलों के चयन में दो प्रमुख शोधों को आधार बनाया गया है। पहला शोध छत्तीसगढ़ के इतिहासकार स्वर्गीय हेमू यदु का है, जो वर्ष 2018 में प्रकाशित पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ पर्यटन में राम वनगमन पथ’ में संकलित है। दूसरा शोध पं. राम अवतार शर्मा का बताया गया है। उन्होंने अयोध्या से श्रीलंका तक भगवान राम के वनगमन मार्ग का अध्ययन किया और देशभर के 240 से अधिक स्थलों का उल्लेख किया। इन्हीं शोधों के आधार पर छत्तीसगढ़ में विकास के लिए स्थलों का चयन किए जाने की बात कही गई है।
पहले चरण में 2026-27 के दौरान इन स्थलों का विकास
योजना के पहले चरण में वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान कई धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को विकसित करने का प्रस्ताव है। इनमें रुद्री, धमतरी स्थित रुद्रेश्वर महादेव मंदिर; नगरी-सिहावा का शृंगी ऋषि-सप्तर्षि आश्रम; खरौद (खरींद); रामाराम; सुकमा स्थित चिंतामीटर मंदिर और शबरी नदी क्षेत्र; चंदन मिहीं रामगढ़; सीता बेंगरा; रायगढ़ का रामझरना; कांकेर के रामपुर-जुनवानी स्थित विष्णु मंदिर; चित्रकोट शिव मंदिर और सीतामढ़ी-हरचौका शामिल हैं।
दूसरे चरण में 2027-28 के दौरान होंगे विकास कार्य
दूसरे चरण के लिए वित्तीय वर्ष 2027-28 निर्धारित किया गया है। इस चरण में राम-लक्ष्मण पायन, सीतामढ़ी-छतोड़ा, सीतामढ़ी-रापा, सीतामढ़ी-कनवाई, सीता लेखनी, सीताकुंड, सारासोर स्थित राम-जानकी मंदिर, पैसर घाट, गड़िया मंदिर, छोटे डोंगर शिव मंदिर तोडमा, सूरजपुर स्थित राम मंदिर और कोटमसर-कोटि महेश्वर को शामिल किया गया है।
तीसरे चरण में 2028-29 तक इन स्थानों को विकसित करने की योजना
तीसरे चरण में वित्तीय वर्ष 2028-29 के दौरान इंजराम शिव मंदिर, सिंगेश्वर, लोमश ऋषि आश्रम, विष्णु मंदिर, कुलेश्वर मंदिर, तीरथगढ़, सीताकुंड, मांडव्य आश्रम, शिवरीनारायण, वाल्मीकि आश्रम, वागेश्वर शिव मंदिर, रक्सा डोंगरी और सिरपुर स्थित राम दिवाला का विकास प्रस्तावित है।
श्रद्धालुओं को मिलेंगी ठहरने और भोजन की सुविधाएं
राम वनगमन पथ के चयनित स्थलों पर आश्रय स्थल, सत्संग भवन और सीता रसोई जैसी सुविधाएं विकसित करने की योजना है। इससे इन स्थानों पर आने वाले श्रद्धालुओं और साधु-संतों को ठहरने तथा भोजन की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। तीन चरणों में होने वाले इस विकास कार्य को वर्ष 2029 तक पूरा करने की योजना बनाई गई है। वहीं, स्थलों के चयन को लेकर उठे सवालों के बीच इस परियोजना के ऐतिहासिक आधार और विकास की प्राथमिकताओं पर चर्चा जारी है।